फांसला रख के क्या हासिल कर लिया तुमने
साहिब
रहते तो आज भी तुम मेरे दिल में ही हो..
बता फिर क्यों नहीं महसूस होती बेचैनियाँ मेरी,
कहती तो अक्सर यही थी कि
बहुत अच्छे से जानती हू तुम्हें..!!
नया कुछ भी नहीं हमदम, वही आलम पुराना है,
तुम्हीं को भुलाने की कोशिशें, तुम्हीं को याद आना है..!
में भी जिन्दा हु….. वो भी जिन्दा है…. कत्ल तो बेचारे इश्क़ का हुआ है |
साल नया होगा तुम्हारे लिए..
हमारे लिए तो बस एक और दिन, तुम्हारे बग़ैर है..!
अब तो रहम कर हालात बदल ऐ ज़िंदगी,
गये वो ज़माने जब किसी को तेरी ज़रूरत हुआ करती थी..!!
नादांनीयां झलकती है अभी भी मेरी आदतो से,
मै खुद हैरान हूं कि मुझे इश्क हुआं कैसे..!!
वो जब पास मेरे होगी तो शायद कयामत होगी,
अभी तो उसकी तस्वीर ने ही तबाही मचा रखी है |
क्या खूब हुनर है,
एक मुस्कराहट तेरी ..
गुस्ताखी माफ़ करती है…
और एक आंसू तेरे गुनाह…….
जो फ़ना हो जाऊँ तेरी चाहत में…तो गुरूर ना करना,
असर नही ये तेरे हुस्न का…ये आलम है मेरी दीवानगी का ..
आपके बिना कही मन नही लगता..
अब बार बार मत पूछो की कैसे हो…!!
हमें तो प्यार के,
दो लफ्ज भी नसीब न हुये…!!
और बदनाम ऐसे हुये जैसे,
इश्क के बादशाह थे हम…!!
कभी फुर्सत मिले तो सोचना जरुर
की
एक लापरवाह लड़का क्यों तेरी परवाह करता था।
पढ़ने वालों की कमी हो गयी है आज इस ज़माने में,
नहीं तो गिरता हुआ एक-एक आँसू पूरी किताब है…!!
जब वो सामने आये तो, अजब तमाशा हुआ..
मेरी हर शिकायतोँ ने जैसे, खुदकुशी कर ली..!!